Nuqoosh Blog

ibne-insha 0

चल इंशा अपने गांव में – इब्न-ए- इंशा

यहां उलझे उलझे रूप बहुत पर असली कम, बहरूप बहुत उस पेड़ के नीचे क्या रुकना जहां साया कम हो, धूप बहुत चल इंशा अपने गांव में बैठेंगे सुख की छाँव में क्यों तेरी...

ibne-insha 0

सब माया है – इब्न-ए-इंशा

सब माया है, सब ढलती फिरती छाया है इस इशक़ में हमने जो खोया जो पाया है जो तुम ने कहा है, फ़ैज़ ने जो फ़रमाया है सब माया है हाँ गाहे-गाहे दीद की दौलत...

Kalim Aajiz 0

रात जी खोल के फिर मैंने दुआ मांगी है – कलीम आजिज़

रात जी खोल के फिर मैंने दुआ मांगी है और इक चीज़ बड़ी बेश-बहा मांगी है और वो चीज़ ना दौलत, ना मकाँ है, ना महल ताज मांगा है, ना दस्तार-ओ-क़बा मांगी है ना...

parveen shakir 0

अब कौन से मौसम से कोई आस लगाए -परवीन शाकिर

अब कौन से मौसम से कोई आस लगाए बरसात में भी याद ना जब उन को हम आए मिट्टी की महक सांस की ख़ुशबू में उतर कर भीगे हुए सब्ज़े की तराई में बुलाए...

habeeb-jalib 0

ये और बात तेरी गली में ना आएं हम – हबीब जालिब

ये और बात तेरी गली में ना आएं हम लेकिन ये कया कि शहर तिरा छोड़ जाएं हम मुद्दत हुई है कू-ए-बुताँ की तरफ़ गए आवारगी से दिल को कहाँ तक बचाएं हम शायद...

habeeb-jalib 0

रह गया काम हमारा ही बग़ावत लिखना – हबीब जालिब

और सब भूल  गए हर्फ़ सदाक़त लिखना रह गया काम हमारा ही बग़ावत लिखना लाख कहते रहें ज़ुल्मत को ना ज़ुल्मत लिखना हमने सीखा नहीं प्यारे ब इजाज़त लिखना ना सिले की ना सताइश की...

Munawwar-Ranaaaa 0

हमारे गांव में छप्पर भी सब मिलकर उठाते हैं – मुनव्वर राना

अजब दुनिया है नाशायर यहां पर सर उठाते हैं जो शायर हैं वो महफ़िल में दरी चादर उठाते हैं तुम्हारे शहर में मय्यत को सब कांधा नहीं देते हमारे गांव में छप्पर भी सब...

Munawwar-Ranaaaa 0

हँसना भी आसान नहीं है, लब ज़ख़मी हो जाते हैं – मुनव्वर राना

रोने में इक ख़तरा है, तालाब, नदी हो जाते हैं हँसना भी आसान नहीं है, लब ज़ख़मी हो जाते हैं स्टेशन से वापिस आकर बूढ़ी आँखें सोचती हैं पत्ते देहाती होते हैं, फल शहरी...

Munawwar-Ranaaaa 0

उनसे मिलीए जो यहां फेर बदल वाले हैं – मुनव्वर राना

उनसे मिलीए जो यहां फेर बदल वाले हैं हमसे मत बोलिए हम लोग ग़ज़ल वाले हैं कैसे शफ़्फ़ाफ़ लिबासों में नज़र आते हैं कौन मानेगा कि ये सब वही कल वाले हैं लूटने वाले...