Nuqoosh Blog

parveen shakir 0

अब कौन से मौसम से कोई आस लगाए -परवीन शाकिर

अब कौन से मौसम से कोई आस लगाए बरसात में भी याद ना जब उन को हम आए मिट्टी की महक सांस की ख़ुशबू में उतर कर भीगे हुए सब्ज़े की तराई में बुलाए...

habeeb-jalib 0

ये और बात तेरी गली में ना आएं हम – हबीब जालिब

ये और बात तेरी गली में ना आएं हम लेकिन ये कया कि शहर तिरा छोड़ जाएं हम मुद्दत हुई है कू-ए-बुताँ की तरफ़ गए आवारगी से दिल को कहाँ तक बचाएं हम शायद...

habeeb-jalib 0

रह गया काम हमारा ही बग़ावत लिखना – हबीब जालिब

और सब भूल  गए हर्फ़ सदाक़त लिखना रह गया काम हमारा ही बग़ावत लिखना लाख कहते रहें ज़ुल्मत को ना ज़ुल्मत लिखना हमने सीखा नहीं प्यारे ब इजाज़त लिखना ना सिले की ना सताइश की...

Munawwar-Ranaaaa 0

हमारे गांव में छप्पर भी सब मिलकर उठाते हैं – मुनव्वर राना

अजब दुनिया है नाशायर यहां पर सर उठाते हैं जो शायर हैं वो महफ़िल में दरी चादर उठाते हैं तुम्हारे शहर में मय्यत को सब कांधा नहीं देते हमारे गांव में छप्पर भी सब...

Munawwar-Ranaaaa 0

हँसना भी आसान नहीं है, लब ज़ख़मी हो जाते हैं – मुनव्वर राना

रोने में इक ख़तरा है, तालाब, नदी हो जाते हैं हँसना भी आसान नहीं है, लब ज़ख़मी हो जाते हैं स्टेशन से वापिस आकर बूढ़ी आँखें सोचती हैं पत्ते देहाती होते हैं, फल शहरी...

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उनसे मिलीए जो यहां फेर बदल वाले हैं – मुनव्वर राना

उनसे मिलीए जो यहां फेर बदल वाले हैं हमसे मत बोलिए हम लोग ग़ज़ल वाले हैं कैसे शफ़्फ़ाफ़ लिबासों में नज़र आते हैं कौन मानेगा कि ये सब वही कल वाले हैं लूटने वाले...

rahat indori 0

सबसे हँस कर मिलना-जुलना बहुत बड़ी बीमारी है – राहत इन्दोरी

सारी बस्ती क़दमों में है, ये भी इक फ़नकारी है वरना बदन को छोड़ के अपना जो कुछ है सरकारी है कालेज के सब लड़के चुप हैं काग़ज़ की इक नाव लिये चारों तरफ़...

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दिलों में आग लबों पर गुलाब रखते हैं – राहत इन्दोरी

दिलों में आग लबों पर गुलाब रखते हैं सब अपने चेहरों पे दोहरी नका़ब रखते हैं हमें चराग समझ कर बुझा न पाओगे हम अपने घर में कई आफ़ताब रखते हैं बहुत से लोग...

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दिल के बाज़ार में बैठे हैँ ख़सारा करके – राहत इन्दोरी

तेरी हर बात मोहब्बत में गवारा करके दिल के बाज़ार में बैठे हैँ ख़सारा करके एक चिन्गारी नज़र आई थी बस्ती मेँ उसे वो अलग हट गया आँधी को इशारा करके मुन्तज़िर  हूँ कि...

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झूटी बुलंदीयों का धुआँ पार कर के आ – राहत इनदोरी

झूटी बुलंदीयों का धुआँ पार कर के आ क़द नापना है मेरा तो छत से उतर के आ इस पार मुंतज़िर हैं तेरी ख़ुश नसीबीयाँ लेकिन ये शर्त है कि नदी पार कर के...