Nuqoosh Blog

Munawwar-Ranaaaa 0

हमारे गांव में छप्पर भी सब मिलकर उठाते हैं – मुनव्वर राना

अजब दुनिया है नाशायर यहां पर सर उठाते हैं जो शायर हैं वो महफ़िल में दरी चादर उठाते हैं तुम्हारे शहर में मय्यत को सब कांधा नहीं देते हमारे गांव में छप्पर भी सब...

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हँसना भी आसान नहीं है, लब ज़ख़मी हो जाते हैं – मुनव्वर राना

रोने में इक ख़तरा है, तालाब, नदी हो जाते हैं हँसना भी आसान नहीं है, लब ज़ख़मी हो जाते हैं स्टेशन से वापिस आकर बूढ़ी आँखें सोचती हैं पत्ते देहाती होते हैं, फल शहरी...

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उनसे मिलीए जो यहां फेर बदल वाले हैं – मुनव्वर राना

उनसे मिलीए जो यहां फेर बदल वाले हैं हमसे मत बोलिए हम लोग ग़ज़ल वाले हैं कैसे शफ़्फ़ाफ़ लिबासों में नज़र आते हैं कौन मानेगा कि ये सब वही कल वाले हैं लूटने वाले...

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सबसे हँस कर मिलना-जुलना बहुत बड़ी बीमारी है – राहत इन्दोरी

सारी बस्ती क़दमों में है, ये भी इक फ़नकारी है वरना बदन को छोड़ के अपना जो कुछ है सरकारी है कालेज के सब लड़के चुप हैं काग़ज़ की इक नाव लिये चारों तरफ़...

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दिलों में आग लबों पर गुलाब रखते हैं – राहत इन्दोरी

दिलों में आग लबों पर गुलाब रखते हैं सब अपने चेहरों पे दोहरी नका़ब रखते हैं हमें चराग समझ कर बुझा न पाओगे हम अपने घर में कई आफ़ताब रखते हैं बहुत से लोग...

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दिल के बाज़ार में बैठे हैँ ख़सारा करके – राहत इन्दोरी

तेरी हर बात मोहब्बत में गवारा करके दिल के बाज़ार में बैठे हैँ ख़सारा करके एक चिन्गारी नज़र आई थी बस्ती मेँ उसे वो अलग हट गया आँधी को इशारा करके मुन्तज़िर  हूँ कि...

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झूटी बुलंदीयों का धुआँ पार कर के आ – राहत इनदोरी

झूटी बुलंदीयों का धुआँ पार कर के आ क़द नापना है मेरा तो छत से उतर के आ इस पार मुंतज़िर हैं तेरी ख़ुश नसीबीयाँ लेकिन ये शर्त है कि नदी पार कर के...

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हमारे क़तल को कहते हैं, ख़ुदकुशी की है – हफीज़ मीरठी

अजीब लोग हैं क्या ख़ूब मुंसफ़ी की है हमारे क़तल को कहते हैं, ख़ुदकुशी की है ये बांकपन था हमारा कि ज़ुलम पर हमने बजाय नाला-ओ-फ़र्याद शायरी की है ज़रा से पांव भिगोए थे...

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तड़पे है मगर दर्द से इनकार करे है – हफीज़ मीरठी

ये बात निराली दिल-ए-ख़ुद्दार करे है तड़पे है मगर दर्द से इनकार करे है दुनिया का ये अंदाज़ समझ में नहीं आता देखे है हक़ारत से कभी प्यार करे है तस्लीम उसे कोई भी...

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जितनी शमएँ थीं सब बुझ गईं – हफीज़ मेरठी

जितनी शमएँ थीं सब बुझ गईं रोशनी दे चिराग़-ए-यक़ीं तुम जवाब-ए-वफ़ा दो ना दो इस से कुछ फ़र्क़ पड़ता नहीं राहज़न सोच में पड़ गए मैंने मिलकर दुआएं जो दीं तेरे दामन से नादिम...